महाभारत काल में कुंती पुत्र भीमसेन को छोड़कर बाकी सभी पांडव — युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और माता द्रौपदी — हर एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से रखते थे। लेकिन भीमसेन के पेट में "वृक" नाम की एक अत्यधिक तीव्र भूख बढ़ाने वाली जठराग्नि थी। इस वजह से वे चाहकर भी भूखे नहीं रह पाते थे।
वे जब भी अपने परिवार को व्रत करते देखते, तो उन्हें बहुत आत्मग्लानि होती थी कि वे भगवान विष्णु की भक्ति नहीं कर पा रहे हैं।
अपनी इस व्यथा को लेकर भीम महर्षि वेदव्यास के पास गए और रोते हुए बोले —
🌸 हे परम पूज्य गुरुदेव! मेरे परिवार के सभी लोग एकादशी का उपवास रखते हैं और मुझसे भी व्रत रखने को कहते हैं। परंतु मैं अपनी भूख को नियंत्रित नहीं कर पाता। क्या भूखे न रहने के कारण मुझे कभी मोक्ष नहीं मिलेगा? कृपया मुझे कोई ऐसा सुलभ उपाय बताएं जिससे मैं नरक की यातनाओं से बच सकूं। 🌸
तब महर्षि वेदव्यास ने मुस्कुराते हुए भीम को ढाँढस बंधाया और कहा —
🌸 हे भीम! व्याकुल मत हो। शास्त्रों में हर समस्या का समाधान है। तुम पूरे वर्ष में केवल एक बार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिना अन्न और बिना जल (निर्जल) के व्रत रखो। इस भीषण गर्मी में पानी का त्याग करना अत्यंत कठिन तपस्या है। यदि तुम यह एक व्रत पूरी निष्ठा से कर लोगे, तो तुम्हें सालभर की सभी एकादशियों का फल एक ही दिन में मिल जाएगा और तुम्हें सीधे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होगी। 🌸
भीमसेन ने गुरु की आज्ञा मानकर अत्यंत कड़े परिश्रम और इच्छाशक्ति से इस व्रत को पूर्ण किया। इसी कारण इस पावन तिथि को भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है। 🙏